@uditprakash
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calendar_today21-04-2009 13:11:24
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4 months ago
सुनो! फ़ैज़ क्या तुम्हें पता है? तुम्हारे और हमारे इंतज़ार का फर्क है महज़ वक़्त-ए-मुअय्यन "फ़क़त चंद रोज़ और" ये जानते थे तुम दस्ते सबा की तरह बेज़बान अब्र नहीं बताता कुछ जब मैं पूछती हूं "ऐसे कितने मौसम और?" जाने कितने मौसम और?