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रवि यथार्थवादी (journalist)

@raviprakashs221

वसूलों पर ग़र आँच आए तो टकराना ज़रूरी है।राष्ट्रवादी हूँ,बनारस से इश्क़ है,शिव ही गुरु।ग़ज़ल प्रेमी, रद्दी शायर ज़िद्दी क़लमकार।यहाँ व्यक्त विचार मेरे निजी हैं

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यही है ना वो हथेलियां जो शब्दों के बूते असल काशी को कागज पर धर देती हैं? वो मुस्कुराने लगते हैं। झुर्रियों वाले उनके चेहरे पर गंगा की लहरें तैर जाती हैं। काशी। गंगा। अस्सी। चाय और बनारसीपन का जिक्र आता है तो ऐनक के पीछे से उनकी आंखें चमचम करने लगती हैं। किस्से कहानियां कई साल

यही है ना वो हथेलियां जो शब्दों के बूते असल काशी को कागज पर धर देती हैं? वो मुस्कुराने लगते हैं। झुर्रियों वाले उनके चेहरे पर गंगा की लहरें तैर जाती हैं।

काशी। गंगा। अस्सी। चाय और बनारसीपन का जिक्र आता है तो ऐनक के पीछे से उनकी आंखें चमचम करने लगती हैं। किस्से कहानियां कई साल
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काशी में ठंड थोड़ी ज्यादा है… और इसलिए हमने बाबा को कंबल चढ़ाया गया है… Happy winters #Kashi #Baba #Winters

काशी में ठंड थोड़ी ज्यादा है…
और इसलिए हमने बाबा को कंबल चढ़ाया गया है…

Happy winters

#Kashi #Baba #Winters
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शिक्षिका बच्चों से पूछती हैं कि तुम कौन हो, तुम्हारा मजहब क्या है, हमें रोजी कौन देता है, जमीन, आसमान, चांद और सूरज किसने बनाया। इन सभी सवालों के जवाब में बच्चे “मुसलमान” और “अल्लाह ताला” कहते हुए सुनाई दे रहे हैं। ये वीडियो आजमगढ़ पब्लिक स्कूल का है। और इनमें से कई बच्चे हिंदू

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हैरानी होगी लेकिन सच ये है कि भारत की सबसे ठंडी रातें हमेशा पहाड़ों में नहीं, बल्कि कई बार मैदानी इलाकों में रिकॉर्ड होती हैं।मौसम सिर्फ तापमान नहीं होता, ये शहर की रफ्तार तय करता है। वो क्या है ना, ठंड के मौसम में ट्रेनें धीमी पड़ती हैं, उड़ानें उतरने से इंकार कर देती हैं और

हैरानी होगी लेकिन सच ये है कि भारत की सबसे ठंडी रातें हमेशा पहाड़ों में नहीं, बल्कि कई बार मैदानी इलाकों में रिकॉर्ड होती हैं।मौसम सिर्फ तापमान नहीं होता, ये शहर की रफ्तार तय करता है।

वो क्या है ना, ठंड के मौसम में ट्रेनें धीमी पड़ती हैं, उड़ानें उतरने से इंकार कर देती हैं और
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जाकिर ख़ान से आज तीसरी बार मुलाक़ात हुई।पहली फोटो दो साल पहले की दूसरी आज की। पहली मुलाक़ात 2007 उनके स्ट्रगल टाइम में दिल्ली में हुई।तब ये नाम उभर रहा था। दूसरी बार बनारस आने पे मैंने की।तीसरी बार उन्होंने कहा रवि कहा हैं बुलाना उसको।उसे पता नहीं ज़ाकिर उसके शहर में हैं।

जाकिर ख़ान से
आज तीसरी बार मुलाक़ात हुई।पहली फोटो दो साल पहले की दूसरी आज की। पहली मुलाक़ात 2007 उनके स्ट्रगल टाइम में दिल्ली में हुई।तब ये नाम उभर रहा था। दूसरी बार बनारस आने पे मैंने की।तीसरी बार उन्होंने कहा रवि कहा हैं बुलाना उसको।उसे पता नहीं ज़ाकिर उसके शहर में हैं।
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हम मानसिक रूप से दोगले नहीं तिगले हैं। संस्कारों से सामन्तवादी हैं, जीवन मूल्य अद्र्ध-पूंजीवादी हैं और बातें समाजवाद की करते हैं। हरिशंकर परसाई

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हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है

हर ज़र्रा चमकता है अनवार-ए-इलाही से
हर साँस ये कहती है हम हैं तो ख़ुदा भी है
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बचपन में जब जर्नलिज़्म का संक्रमण मुझे लगा, तो उसकी एक बड़ी वजह Vijay Manohar Tiwari जी भी थे। नईदुनिया और सहारा समय में उन्हें पढ़ना, सुनना और देखना अद्भुत अनुभव होता था। फिर वह वक्त भी आया जब दो-स्तंभ वाली टीम का एक हिस्सा मैं थी और एक वो। एक ओर वे शब्दों के जादूगर थे और मैं नौसिखिया। तब