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Prem Kumar Anand

@p_k_anand

गीत गाने दो मुझे अब,
क्रूर रथ को रोकने को...
कर रहा संधान शर का,
विष घटक को तोड़ने को...

ID: 2923672500

calendar_today09-12-2014 10:30:15

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वसुधा हुयी है तप्त क्यों, नदियों ने बदला रूप अब, हर जीव क्यों संतप्त है, सब क्यों विकल हैं जग में अब... 🤨 सोचने वाली बात है #विश्वपर्यावरणदिवस Prem Kumar Anand #WorldEnvironmentDay2020

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🔴Join NOW: LAUNCH of our #Bihar Inequality Report with Prof. DM Diwakar (ANSISS); Sanjeev Kumar Karamveer (Congress),Prem Ranjan Patel (BJP); Rajesh Bhatt (#LJP); Mritunjay Tiwari #RJD; Kumar Parvez CPI (M); Dr Sanjay Verma (#JDU) global.gotomeeting.com/join/712253213

🔴Join NOW:  

LAUNCH of our #Bihar Inequality Report with Prof. DM Diwakar (ANSISS); Sanjeev Kumar Karamveer (<a href="/INCIndia/">Congress</a>),Prem Ranjan Patel (<a href="/BJP4India/">BJP</a>); Rajesh Bhatt (#LJP); Mritunjay Tiwari #RJD;  Kumar Parvez <a href="/cpimspeak/">CPI (M)</a>; Dr Sanjay Verma (#JDU) 

 global.gotomeeting.com/join/712253213
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गोदान का होरी धनिया से कहता है - "जब दूसरे के पाँवों-तले अपनी गर्दन दबी हुई है, तो उन पाँवों के सहलाने में ही कुशल है।’’ आज का किसान प्रेमचन्द का होरी नहीं बनना चाहता। उसके लिए सम्मान और प्रतिष्ठा बिकाऊ नहीं। @

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यहाँ तो जो किसान है, वह सबका नरम चारा है। पटवारी को नजराना और दस्तूरी न दे तो गाँव में रहना मुश्किल। जमींदार के चपरासी और कारिन्दों का पेट न भरे तो निबाह न हों। थानेदार और कानिसिटबिल तो जैसे उसके दामाद हैं...." प्रेमचन्द

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यह दुनिया एक मायावी क्रीड़ांगन है। यहां कुछ लोग खुल्ला खेल फर्रुखाबादी करते हैं। इस खेल परिसर में लोक-लाज, रीति-नीति, मर्यादा-आचरण, धर्म-अधर्म, का नकली चोला एक समय उतर जाता है। ऐसे समय राजसी निर्लज्जता चारों ओर पसरी दिखेगी। ओ दुर्गंध।

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The woods are lovely, dark and deep......Miles to go before 'we' sleep! In these challenging times we renew our commitment to a just, humane, sustainable, equal and discrimination free future!

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It is so gratifying to be part of strengthening the public health system and doing our bit in ensuring availability of Oxygen for a hospital with 80 beds. A big thank you to everyone involved Oxfam India Nilesh Deore

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ऑक्सफैम इंडिया द्वारा संचालित 'मिशन संजीवनी'... कोविड 19 महामारी से लड़ने में देश को अधिक सक्षम बनाने का सतत प्रयास... बिहार के सोनपुर अनुमंडल अस्पताल में ऑक्सीजन प्लांट का उदघाटन श्री नीलेश सर, जिलाधिकारी सारण एवं श्री पंकज आनंद, ऑक्सफैम इंडिया द्वारा... अनेक आभार 🙏

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धधक कर जल उठा मैं अग्निमंडित धरा का सूर्य होना चाहता हूँ, जीत होगी या महानिर्वाण मेरा पवन का तूर्य होना चाहता हूँ... © प्रेम

धधक कर जल उठा मैं अग्निमंडित
धरा का सूर्य होना चाहता हूँ,
जीत होगी या महानिर्वाण मेरा
पवन का तूर्य होना चाहता हूँ...

© प्रेम
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चले, चल कर कहाँ पहुंचे, कहाँ रुकना, कहाँ थमना... मैं सोया नींद भर कब था, अभी तक जग रहा तन्हा... नकाबों की गज़ब दुनिया, परेशाँ कर रही हमको... तेरी यादों से बस रौशन, अभी है भोर तक चलना... © प्रेम

चले, चल कर कहाँ पहुंचे,
कहाँ रुकना, कहाँ थमना...
मैं सोया नींद भर कब था,
अभी तक जग रहा तन्हा...

नकाबों की गज़ब दुनिया,
परेशाँ कर रही हमको...
तेरी यादों से बस रौशन,
अभी है भोर तक चलना...

© प्रेम
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उड़ गये रंग, हुए श्वेत हम बीता बसंत हुए ज्येष्ठ हम... बढ़ चली उम्र, आवेश थमा प्रवाह थमा, हुए रेत हम... © प्रेम #prempoetry

उड़ गये रंग, हुए श्वेत हम
बीता बसंत हुए ज्येष्ठ हम...
बढ़ चली उम्र, आवेश थमा
प्रवाह थमा, हुए रेत हम...

© प्रेम

#prempoetry
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तोड़ कलम अब तेग बनाकर क्यूँ ना अब हम भी तोलें जिनकी हार सजायी तुमने क्यों ना अब वो भी बोलें । वो बैठे राजसभाओं में वो गढ़ते खेल विधानों का तुम दावानल सा बढ़े चलो अब प्रश्न तुम्हारे मानों का । छुपा रिपु जो छद्म वेश धर उनको बढ़ ललकारो आज कर शर का संधान दिव्यतम उनके शीश उतारो आज ।

तोड़ कलम अब तेग बनाकर
क्यूँ ना अब हम भी तोलें
जिनकी हार सजायी तुमने
क्यों ना अब वो भी बोलें ।

वो बैठे राजसभाओं में
वो गढ़ते खेल विधानों का
तुम दावानल सा बढ़े चलो
अब प्रश्न तुम्हारे मानों का ।

छुपा रिपु जो छद्म वेश धर
उनको बढ़ ललकारो आज
कर शर का संधान दिव्यतम
उनके शीश उतारो आज ।
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बढ़ रहा था वो अकेला पंथ विपरीत सांध्य बेला... नग्न पग थे पथ कटीले थी अमावस सी वो बेला... स्वेद, शोणित, अश्रु सिंचित धूमिल चक्षु मन में मेला... बढ़ रहा था चिर अकेला पंथ विपरीत सांध्य बेला... © प्रेम #prempoetry

बढ़ रहा था
वो अकेला
पंथ विपरीत
सांध्य बेला...

नग्न पग थे
पथ कटीले
थी अमावस
सी वो बेला...

स्वेद, शोणित,
अश्रु सिंचित
धूमिल चक्षु
मन में मेला...

बढ़ रहा था
चिर अकेला
पंथ विपरीत
सांध्य बेला...

© प्रेम

#prempoetry
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अरमानों की अनबुझ पहेली, बन दिल में तेरा यूँ इतराना, जीने के हर पल में पल - पल, बन ख्वाब तेरा ये मुस्काना.... मेरे सितार की धुन में शामिल, हम दोनों की मीठी यादें, इन यादों के छत पर आकर, गीतों में मेरे ढल जाना.... © प्रेम #prempoetry

अरमानों की अनबुझ पहेली,
बन दिल में तेरा यूँ इतराना,
जीने के हर पल में पल - पल,
बन ख्वाब तेरा ये मुस्काना....

मेरे सितार की धुन में शामिल,
हम दोनों की मीठी यादें,
इन यादों के छत पर आकर,
गीतों में मेरे ढल जाना....

© प्रेम 

#prempoetry
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ख़्वाबों में जब गीत बुना था, कभी ज्वाल कभी शीत बुना था, तोड़ पिंजर नभ नाप रहा मैं, पथ - मंजिल विपरीत चुना था... © प्रेम

ख़्वाबों में जब गीत बुना था,
कभी ज्वाल कभी शीत बुना था,
तोड़ पिंजर नभ नाप रहा मैं,
पथ - मंजिल विपरीत चुना था...

© प्रेम