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niraj singh

@nirajsingh2013

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calendar_today13-07-2025 03:08:00

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जो देख रहे हो, जो सोच रहे हो, जो कर रहे हो, सोचो कि वह तुम्हारी सोच है। दुनिया की छाया में खोए हुए हो, क्या तुम सोए हुए हो? बाहरी आवाजों में डूबे हुए, क्या खो दिया है असली रंग? सोचो, खोजो उस गहराई को, जहाँ तुम हो सच्चे, बिना किसी संग।

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सच का पता ही नहीं चलता, झूठ इतना फैलाया हुआ है। तुझे हमने कितना चाहा, और तू ही हमको सताया हुआ है। वादे तो वादे ही होते हैं, तू तो जहाँ से झुटलाया हुआ है। फिर झूठ कहते हैं सच्चे लोग, रुपया गिरा नहीं, डॉलर उछलाया हुआ है।

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धड़कनों को कुछ तो काबू में कर ऐ दिल, अभी तो उन्होंने पलकें झुकाई हैं, मुस्कुराना अभी बाकी है। हवा में उनकी खुशबू अभी बस हल्की-सी बसी है, आँधियों-सी वो आहट, दिल में समाना अभी बाकी है। उनकी अदाओं का सिलसिला तो बस शुरू हुआ है, हर लम्हे का अक्स आँखों में सजाना अभी बाकी है। मुलाकात

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फागुनी शाम अंगूरी उजास बतास में जंगली गंध का डूबना ऐंठती पीर में दूर, बराह-से जंगलों के सुनसान का कूँथना। बेघर बेपहचान दो राहियों का नत शीश न देखना, न पूछना। शाल की पंक्तियों वाली निचाट-सी राह में घूमना घूमना घूमना।