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शून्य (@shoonyapoetry) 's Twitter Profile Photo

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं ~ कृष्ण बिहारी नूर

इतने हिस्सों में बट गया हूँ मैं
मेरे हिस्से में कुछ बचा ही नहीं

~ कृष्ण बिहारी नूर
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"मैं सच की तलब में ख़ुद को ही परखता रहा, मगर हक़ की आवाज़ मैं सुन न सका। सफ़र तो अंदर ही कहीं छुपा हुआ था, मैं सारी उम्र बाहरी राहों पर भटकता रहा।"

"मैं सच की तलब में ख़ुद को ही परखता रहा,
मगर हक़ की आवाज़ मैं सुन न सका।
सफ़र तो अंदर ही कहीं छुपा हुआ था,
मैं सारी उम्र बाहरी राहों पर भटकता रहा।"
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ये सियाह रात न मुझे सोने दे, न ही मरने, दिल की चीखें कह रहीं—कहाँ जाऊँ मैं ठहरने मैं अपने ही साए से यूँ रोज़ जंग लड़ता हूँ, कोई तो रास्ता दिखाए मुझे ख़ुद से निकलने। ये रूह भी थकी हुई है, बदन भी टूट जाता, ना जीने की वजह मिलती, ना कोई बहाना मरने।

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बज़्म-ए सुख़न بزمِ سخن हमसे पहले भी कई हमसफ़र दावे तो करते गुज़रे, पर हमदर्दी में दो कदम भी बढ़ाते नज़र नहीं आए। राह सँवार जाना तो नेकियों का चलन है जनाब, ये लोग तो अपना बोझ तक उठाते नहीं— दूसरों का क्या हटाते!

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ए ख़ुदा, तू तो जानता है, मैं क्या से क्या हो गया, तेरी बनाई रूह था, अब बस एक साया रह गया। किस दफ़्तर में दायर है मेरी पहचान का दावा, तेरी दुनिया में भी लगता है मैं बेमायना हो गया। तूने भेजा था यक़ीन लेकर इस सफ़र पर मुझे, फिर आज यूँ क्यों शक़ों का मुसाफ़िर हो गया?

ए ख़ुदा, तू तो जानता है, मैं क्या से क्या हो गया,
तेरी बनाई रूह था, अब बस एक साया रह गया।

किस दफ़्तर में दायर है मेरी पहचान का दावा,
तेरी दुनिया में भी लगता है मैं बेमायना हो गया।

तूने भेजा था यक़ीन लेकर इस सफ़र पर मुझे,
फिर आज यूँ क्यों शक़ों का मुसाफ़िर हो गया?
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“ए ख़ुदा, सुन—आख़िर मुझे मिला ही क्या, बस तजुर्बे मिले, पर मेरा दिल लिया ही क्या। मैंने तेरे नाम पर हर ज़ख़्म भी सह लिया, अब तू बता—इस सफ़र में बचा ही क्या?”

“ए ख़ुदा, सुन—आख़िर मुझे मिला ही क्या,
बस तजुर्बे मिले, पर मेरा दिल लिया ही क्या।
मैंने तेरे नाम पर हर ज़ख़्म भी सह लिया,
अब तू बता—इस सफ़र में बचा ही क्या?”
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उसने मुझे ये तन्हाई छोड़ दी है, जैसे कोई मौसम अचानक सूना कर जाए। वो चला भी गया तो क्या, उसकी कमी हर कमरे में साँस बनकर फैल जाए। मैं पूछूँ भी तो किससे पूछूँ— किस हक़ से उसने मेरा सुकून मुझसे छीन लियाl

उसने मुझे ये तन्हाई छोड़ दी है,
जैसे कोई मौसम अचानक सूना कर जाए।
वो चला भी गया तो क्या,
उसकी कमी हर कमरे में साँस बनकर फैल जाए।
मैं पूछूँ भी तो किससे पूछूँ—
किस हक़ से उसने मेरा सुकून मुझसे छीन लियाl
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“मालिक, कहाँ है तू?”—मैं हर रात पूछता हूँ, छत पर बिखरे तारों में तेरा पता ढूँढता हूँ। दुआओँ के लफ़्ज़ भी कभी थक से जाते हैं, मगर उम्मीद फिर तेरे दर तक ले जाती है। अगर तू सामने नहीं—तो फिर ये हौसला किसका है? शायद तू वहीं है… बस मेरा यक़ीन थोड़ा कम है।

“मालिक, कहाँ है तू?”—मैं हर रात पूछता हूँ,
छत पर बिखरे तारों में तेरा पता ढूँढता हूँ।
दुआओँ के लफ़्ज़ भी कभी थक से जाते हैं,
मगर उम्मीद फिर तेरे दर तक ले जाती है।
अगर तू सामने नहीं—तो फिर ये हौसला किसका है?
शायद तू वहीं है… बस मेरा यक़ीन थोड़ा कम है।
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mo-shaad🕊️ धूप में खड़े उस दरवाज़े पर, वक्त जैसे ठहर सा गया, एक ने उम्मीद ओढ़ रखी, एक ने ख़ामोशी कह दिया। नज़रें दोनों की मिलती हैं, पर अल्फ़ाज़ कहीं खो जाते हैं, कुछ रिश्ते ऐसे भी होते हैं, जो दरवाज़ों पर ही रह जाते हैं।

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ठंडी का दिन है, सर्द हवा का कहर है, प्लेटफॉर्म पर पड़ी ये रात भी बेख़बर है। रेल पर सिमटे हुए ख़्वाब सो रहे हैं, ये जो ट्रेन पे बैठे हैं… सब हालात के मारे हैं।

ठंडी का दिन है, सर्द हवा का कहर है,
प्लेटफॉर्म पर पड़ी ये रात भी बेख़बर है।
रेल पर सिमटे हुए ख़्वाब सो रहे हैं,
ये जो ट्रेन पे बैठे हैं… सब हालात के मारे हैं।
Divya (@divya72709095) 's Twitter Profile Photo

किसी को बांध कर रखना मेरी फितरत नहीं मैं स्नेह का धागा हूं, मजबूरी की जंजीर नहीं.. Divya

किसी को बांध कर रखना मेरी फितरत नहीं 
मैं स्नेह का धागा हूं, मजबूरी की जंजीर नहीं..

<a href="/Divya72709095/">Divya</a>
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वो ट्रेन का स्टाफ था, गेट पे ही खड़ा रहा उम्र भर, लोग मंज़िलों तक पहुँचे, उसका सफ़र वहीं ठहर गया। सीटी उसकी थी, पर सफ़र किसी और का था, हर रोज़ रवाना हुआ, मगर खुद कहीं न उतर गया। तालियाँ यात्रियों को मिलीं, शुक्रिया किसी ने न कहा, जो सफ़र चलाता रहा, वही सबसे पीछे रह गया।

वो ट्रेन का स्टाफ था, गेट पे ही खड़ा रहा उम्र भर,
लोग मंज़िलों तक पहुँचे, उसका सफ़र वहीं ठहर गया।
सीटी उसकी थी, पर सफ़र किसी और का था,
हर रोज़ रवाना हुआ, मगर खुद कहीं न उतर गया।
तालियाँ यात्रियों को मिलीं, शुक्रिया किसी ने न कहा,
जो सफ़र चलाता रहा, वही सबसे पीछे रह गया।