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आक़ा ए दो आलम नबी ए करीम मोहम्मद सल्ललाहो अलैह ए वसल्लाम की सबसे पहली अहलीया बीबी ख़दीजा का रौज़ा मुबारक जो मक्का मे मौजुद है. फ़ोटो 1900 के आस पास का है जब ये इलाक़ा उस्मानीयो के ज़ेर ए निगरानी था. The tomb of the first wife of the Prophet Muhammad, Khadija, Ottoman Mecca,

आक़ा ए दो आलम नबी ए करीम मोहम्मद सल्ललाहो अलैह ए वसल्लाम की सबसे पहली अहलीया बीबी ख़दीजा का रौज़ा मुबारक जो मक्का मे मौजुद है. फ़ोटो 1900 के आस पास का है जब ये इलाक़ा उस्मानीयो के ज़ेर ए निगरानी था. 

The tomb of the first wife of the Prophet Muhammad, Khadija, Ottoman Mecca,
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जहां आरा बेगम ऑफ पालनपुर स्टेट जहां आरा बेगम का असली नाम joan falkiner था ये एक ऑस्ट्रेलिया के राजनेतिक परिवार की उत्तराधिकारी थीं इनकी शादी पालन पुर के नवाब तल्हा खान से हुई थी तल्हा खान से इनकी मुलाकात जर्मनी हुई थी जहां तल्हा खान अपनी किसी गंभीर चोट का इलाज करवा रहे थे...

जहां आरा बेगम ऑफ पालनपुर स्टेट

जहां आरा बेगम का असली नाम joan falkiner था ये एक ऑस्ट्रेलिया के राजनेतिक परिवार की उत्तराधिकारी थीं इनकी शादी पालन पुर के नवाब तल्हा खान से हुई थी तल्हा खान से इनकी मुलाकात जर्मनी हुई थी जहां तल्हा खान अपनी किसी गंभीर चोट का इलाज करवा रहे थे...
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वफ़ा बिहारी का असल नाम इक़बाल अली ख़ान था, वफ़ा तख़ल्लुस था, आपका ताल्लुक़ बिहार के नालंदा ज़िले के पनहर से था। वालिद का नाम अमीरिद्दीन अली ख़ान था। आपकी पैदाइश 18 रज्जब 1259 हिजरी यानी 15 अगस्त 1843 को हुई थी। आपने घर पर रह कर ही तालीम हासिल की। उर्दू, अरबी और फ़ारसी जैसी ज़ुबान

वफ़ा बिहारी का असल नाम इक़बाल अली ख़ान था, वफ़ा तख़ल्लुस था, आपका ताल्लुक़ बिहार के नालंदा ज़िले के पनहर से था। वालिद का नाम अमीरिद्दीन अली ख़ान था। आपकी पैदाइश 18 रज्जब 1259 हिजरी यानी 15 अगस्त 1843 को हुई थी। आपने घर पर रह कर ही तालीम हासिल की। उर्दू, अरबी और फ़ारसी जैसी ज़ुबान
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दिल्ली की जामा मस्जिद 1858 में कुछ इस तरह दिखती थी। जिसे 1857की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों ने अपना अस्तबल बना दिया था।

दिल्ली की जामा मस्जिद 1858 में कुछ इस तरह दिखती थी। जिसे 1857की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों ने अपना अस्तबल बना दिया था।
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Situated atop the rugged hills of Bijapur, India, this imposing cannon, known as the Malik-e-Maidan, was forged from one piece of copper in the late 16th century during the reign of the Muslim Adil Shahi dynasty. As one of the largest surviving medieval cannons. Tarikh-i Hind

Situated atop the rugged hills of Bijapur, India, this imposing cannon, known as the Malik-e-Maidan, was forged from one piece of copper in the late 16th century during the reign of the Muslim Adil Shahi dynasty. As one of the largest surviving medieval cannons.

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फलस्तीन है किसका? आइये जानते हैं ! फलस्तीन अम्बिया, अहलेबैत, सहाबा, उलेमा और औलिया की सरजमीन है। ये वो सरजमीन है जिसका क़ुरान व हदीस में जिक्र है। ये वो सरजमीन है जहां नबी-ए-करीम ﷺ ने रात के एक मुख़्तसर अरसे में सफर किया था इसी सरजमीन पर हमारे नबी ﷺ ने तमाम अम्बिया व मुरसलीन की

फलस्तीन है किसका? आइये जानते हैं ! फलस्तीन अम्बिया, अहलेबैत, सहाबा, उलेमा और औलिया की सरजमीन है। ये वो सरजमीन है जिसका क़ुरान व हदीस में जिक्र है। ये वो सरजमीन है जहां नबी-ए-करीम ﷺ ने रात के एक मुख़्तसर अरसे में सफर किया था इसी सरजमीन पर हमारे नबी ﷺ ने तमाम अम्बिया व मुरसलीन की
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ये बहादुराबाद कराची का चारमीनार है। कराची का बहादुराबाद क़स्बा MIM नेता "बहादुर यार जंग" के नाम पर पड़ा था, 1948 बंटवारे के बाद MIM नेता क़ासिम रिज़वी के साथ हैदराबाद से कई मुहज़रीन कराची में जाकर बस गए और कराची में ही चारमीनार जैसी हूबहू ईमारत की तामीर करवाई।

ये बहादुराबाद कराची का चारमीनार है। कराची का बहादुराबाद क़स्बा MIM नेता "बहादुर यार जंग" के नाम पर  पड़ा था, 1948 बंटवारे के बाद MIM नेता क़ासिम रिज़वी के साथ हैदराबाद से कई मुहज़रीन कराची में जाकर बस गए और कराची में ही चारमीनार जैसी हूबहू ईमारत की तामीर करवाई।
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34वें उस्मानी सुल्तान व ख़लीफ़ा अब्दुल हमीद II का जुलूस जुमा की नमाज़ के लिए जाते हुए - इस्तांबुल 1908

34वें उस्मानी सुल्तान व ख़लीफ़ा अब्दुल हमीद II का जुलूस जुमा की नमाज़ के लिए जाते हुए - इस्तांबुल 1908
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1 सितंबर, 1900 को, सुल्तान अब्दुलहमीद द्वितीय के आदेश पर,खिलाफत ए उस्मानिया अधिकारियों ने मदीना मुनव्वरा को दमिशक (सीरीया) और तुर्की के इस्तांबुल से जोड़ने वाली 1,320 किलोमीटर रेलवे प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। ये प्रोजेक्ट सितंबर 1908 में कंप्लीट हो गया था और प्रथम विश्व

1 सितंबर, 1900 को, सुल्तान अब्दुलहमीद द्वितीय के आदेश पर,खिलाफत ए उस्मानिया अधिकारियों ने मदीना मुनव्वरा को दमिशक (सीरीया) और तुर्की के इस्तांबुल से जोड़ने वाली 1,320 किलोमीटर रेलवे प्रोजेक्ट पर काम करना शुरू किया। ये प्रोजेक्ट सितंबर 1908 में कंप्लीट हो गया था और प्रथम विश्व
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Ottoman officials in Jerusalem (al-Quds) before its fall to the British in WW1, c. 1917 The Ottomans conquered Jerusalem when Sultan Selim I defeated the Mamluks in the Battle of Marj al-Dabiq (August 24, 1516). After his victory, Aleppo and Damascus both surrendered without a

Ottoman officials in Jerusalem (al-Quds) before its fall to the British in WW1, c. 1917

The Ottomans conquered Jerusalem when Sultan Selim I defeated the Mamluks in the Battle of Marj al-Dabiq (August 24, 1516). After his victory, Aleppo and Damascus both surrendered without a
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ग्वालियर की शाही मस्जिद की तामीर सुल्तान इब्राहिम लोदी ने 1516 में करवाई थी। लोदी सल्तनत के खात्मे के बाद आगे चल कर मुग़ल बादशाह औरंगजेब आलमगीर की हुक़ूमत में इस मस्जिद को लाल पत्थर से संवारा गया था। बहुत ख़ूबसूरत मस्जिद है।

ग्वालियर की शाही मस्जिद की तामीर सुल्तान इब्राहिम लोदी ने 1516 में करवाई थी। लोदी सल्तनत के खात्मे के बाद आगे चल कर मुग़ल बादशाह औरंगजेब आलमगीर की हुक़ूमत में इस मस्जिद को लाल पत्थर से संवारा गया था। बहुत ख़ूबसूरत मस्जिद है।
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सुल्तान अलाउद्दीन कैकुबाद I की वफ़ात के बाद जब उनके बेटे सुल्तान गयासुद्दीन कायखुसरो II तख़्त पर बैठे तब उनमे अपनी सरहदों को महफूज रखने की सलाहियत नहीं थी। जब मंगोलों को इस बात का एहसास हुआ तब उन्होंने अनातोलिया पर हमला करने का फैसला किया और 1242 से 43 के बीच हमला कर एर्ज़ुरम शहर

सुल्तान अलाउद्दीन कैकुबाद I की वफ़ात के बाद जब उनके बेटे सुल्तान गयासुद्दीन कायखुसरो II तख़्त पर बैठे तब उनमे अपनी सरहदों को महफूज रखने की सलाहियत नहीं थी। जब मंगोलों को इस बात का एहसास हुआ तब उन्होंने अनातोलिया पर हमला करने का फैसला किया और 1242 से 43 के बीच हमला कर एर्ज़ुरम शहर
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Tomb of Sultan Ahmad Sanjar, a monumental Seljuk-era mausoleum located in Merv, present-day Turkmenistan. Sanjar ruled over Khorasan and Central Asia, and this tomb became not just a burial place but a symbol of the empire's final days.

Tomb of Sultan Ahmad Sanjar, a monumental Seljuk-era mausoleum located in Merv, present-day Turkmenistan.

Sanjar ruled over Khorasan and Central Asia, and this tomb became not just a burial place but a symbol of the empire's final days.
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मियां मीर लाहौरी ने रखी थी स्वर्ण मंदिर की बुनियाद. स्वर्ण मंदिर जिस का पुराना नाम हरमंदिर साहब है इस का संग ए बुनियाद जहांगीर के ज़माने के मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग हज़रत मुहम्मद मियां मीर लाहौरी ने रखा था. मियां साहब अपने ज़माने के मशहूर ओ मारूफ बुजुर्ग थे. आपका ताल्लुक़ तसव्वुफ़

मियां मीर लाहौरी ने रखी थी स्वर्ण मंदिर की बुनियाद.

स्वर्ण मंदिर जिस का पुराना नाम हरमंदिर साहब है इस का संग ए बुनियाद जहांगीर के ज़माने के मशहूर सूफ़ी बुज़ुर्ग हज़रत मुहम्मद मियां मीर लाहौरी ने रखा था. मियां साहब अपने ज़माने के मशहूर ओ मारूफ बुजुर्ग थे. आपका ताल्लुक़ तसव्वुफ़
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बनारस के रौज़ा-ए-फ़ातिमा पर मुहर्रम के दौरान ताजिया ले जाते हुए इस जगह का नाम अब फातमान है। ये जगह बनारस के राजा चेतसिंह ने अपने उस्ताद शेख मोहम्मद अली को उपहार में दिया था। शेख मोहम्मद अली ने राजा चेतसिंह के परिवार को फ़ारसी सिखाई थी। उस वक़्त फ़ारसी अधिकारिक भाषा थी देश की

बनारस के रौज़ा-ए-फ़ातिमा पर मुहर्रम के दौरान ताजिया ले जाते हुए इस जगह का नाम अब फातमान है। ये जगह बनारस के राजा चेतसिंह ने अपने उस्ताद शेख मोहम्मद अली को उपहार में दिया था। शेख मोहम्मद अली ने राजा चेतसिंह के परिवार को फ़ारसी सिखाई थी। उस वक़्त फ़ारसी अधिकारिक भाषा थी देश की
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दिल्ली की कलाँ मस्जिद जिसे तुग़लक़ दौर में इस्लाम क़बूल किए मक़बूल तलंगी के बेटे जौना शाह ने बनवाया था। उसने इस तरह की आठ बड़ी बड़ी मस्जिद अकेले दिल्ली में बनवाईं थी। चाहे वो खिड़की मस्जिद हो या फिर बेगमपुर मस्जिद हो। अल्लाह का काम नहीं रुकता है, उसको काम लेना होता है तो वो

दिल्ली की कलाँ मस्जिद जिसे तुग़लक़ दौर में इस्लाम क़बूल किए मक़बूल तलंगी के बेटे जौना शाह ने बनवाया था। उसने इस तरह की आठ बड़ी बड़ी मस्जिद अकेले दिल्ली में बनवाईं थी। चाहे वो खिड़की मस्जिद हो या फिर बेगमपुर मस्जिद हो। 

अल्लाह का काम नहीं रुकता है, उसको काम लेना होता है तो वो
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ये तस्वीर 1780 की है जब अवध में सूखा पड़ा। लोगों रोजगार मुहैया कराने के लिए नवाब आसिफुद्दौला ने इमारतों के तामीर काम शुरू करवाया जिसमें हज़ारों लोगों को कई सालों तक रोजगार मिला। ये तस्वीर उसी वक़्त की है, लखनऊ वाले पहचान सकते है ये कौन सी इमारत की तामीर चल रही है?

ये तस्वीर 1780 की है जब अवध में सूखा पड़ा। लोगों रोजगार मुहैया कराने के लिए नवाब आसिफुद्दौला ने इमारतों के तामीर काम शुरू करवाया जिसमें हज़ारों लोगों को कई सालों तक रोजगार मिला।

ये तस्वीर उसी वक़्त की है, लखनऊ वाले पहचान सकते है ये कौन सी इमारत की तामीर चल रही है?
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क़र्बला के शहीदों की याद में पढ़ा जाने वाला मर्सिया अवधकाल में युपी के गाज़ीपुर जिले में लिखा गया अवध के नवाबों की हकूमत में मर्सिया जो उर्दू शायरी की एक किस्म है, उसकी नींव पड़ी। मर्सिया या नौहे में कर्बला में शहीद हुए लोगो को याद किया जाता है, कैसे उन्हें बहुत बेरहमी से शहीद

क़र्बला के शहीदों की याद में पढ़ा जाने वाला मर्सिया अवधकाल में युपी के गाज़ीपुर जिले में लिखा गया अवध के नवाबों की हकूमत में मर्सिया जो उर्दू शायरी की एक किस्म है, उसकी नींव पड़ी। मर्सिया या नौहे में कर्बला में शहीद हुए लोगो को याद किया जाता है, कैसे उन्हें बहुत बेरहमी से शहीद
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The mausoleum at Srirangapatna, Karnataka, India housing Tipu Sultan's tomb is another example of Islamic architecture.Tipu Sultan's flag is in the foreground. Tarikh-i Hind تاریخِ ھند #TarikhiHind

The mausoleum at Srirangapatna, Karnataka, India housing Tipu Sultan's tomb is another example of Islamic architecture.Tipu Sultan's flag is in the foreground.

Tarikh-i Hind تاریخِ ھند #TarikhiHind
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मराठों की फ़ौज में एक टुकड़ी अलीगोल के नाम से होती थी। जिसमें मुस्लिम सिपाही होते थे। जो गोल घेरे में दुश्मन पर हमला करते थे और या अली का नारा बुलंद करते थे। इसी वजह कर इनको अलीगोल कहा जाता था। इन मुस्लिम सिपाहियों का असर मराठा सरदारों पर किस क़दर था, इसका अंदाज़ा आप इस बात से

मराठों की फ़ौज में एक टुकड़ी अलीगोल के नाम से होती थी। जिसमें मुस्लिम सिपाही होते थे। जो गोल घेरे में दुश्मन पर हमला करते थे और या अली का नारा बुलंद करते थे। इसी वजह कर इनको अलीगोल कहा जाता था।

इन मुस्लिम सिपाहियों का असर मराठा सरदारों पर किस क़दर था, इसका अंदाज़ा आप इस बात से