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adarsh bhushan

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एक अचानक के बीच | Website Link: bit.ly/3kY3GFX | Amazon Link: amzn.eu/d/iDe3p27

ID: 3584460974

linkhttps://www.hindwi.org/poets/aadarsh-bhushan calendar_today16-09-2015 16:25:57

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Abhivykti__arts (@abhivykti__arts) 's Twitter Profile Photo

' एक अचानक के बीच ' कविता संग्रह से ~ adarsh bhushan 🐿️ पोस्टर ~ Anjali Neekhra ( जुगनू ) आप किताब अमेजन से और अगर आप इलाहबाद ( प्रयागराज ) से है तो ' सबद ' से मंगवा सकते है।

' एक अचानक के बीच ' कविता संग्रह से ~ <a href="/imadarshbhushan/">adarsh bhushan</a> 🐿️

पोस्टर ~ <a href="/anjali_nikhra/">Anjali Neekhra ( जुगनू )</a>

आप किताब अमेजन से और अगर आप इलाहबाद ( प्रयागराज ) से है तो ' सबद ' से मंगवा सकते है।
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''अर्थों के पीछे शब्द कितने आधुनिक और बनावटी लगते हैं। जैसे जीवन। जीवन अपने अर्थों में कितना व्यस्त और असमाप्त किंतु अपनी शाब्दिकी में कसा हुआ और क्रूर-निष्ठुर। इसी में तंद्रा और भूख की सहार्ध कड़वाहट।'' (hindwi.org/blogs/samaygho…) #Hindwiblog #हिन्दवीब्लॉग #Hindwi #हिन्दवी

''अर्थों के पीछे शब्द कितने आधुनिक और बनावटी लगते हैं। जैसे जीवन। जीवन अपने अर्थों में कितना व्यस्त और असमाप्त किंतु अपनी शाब्दिकी में कसा हुआ और क्रूर-निष्ठुर। इसी में तंद्रा और भूख की सहार्ध कड़वाहट।''

(hindwi.org/blogs/samaygho…)

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“मृत्यु के आईने में जीवन कितना कुरूप दिखता होगा। भंगुर की उपस्थिति में आसक्तियों का इतना कबाड़। इतनी व्यवस्था भी नहीं कि विदा कहने के अर्थों में पीड़ा बची रहे समय के बीच और बीच के बाद और बहुत बाद तक।” पूरा ब्लॉग Hindwi की वेबसाइट पर है। लिंक: hindwi.org/blogs/samaygho…

“मृत्यु के आईने में जीवन कितना कुरूप दिखता होगा। भंगुर की उपस्थिति में आसक्तियों का इतना कबाड़। इतनी व्यवस्था भी नहीं कि विदा कहने के अर्थों में पीड़ा बची रहे समय के बीच और बीच के बाद और बहुत बाद तक।”

पूरा ब्लॉग <a href="/hindwiOfficial/">Hindwi</a> की वेबसाइट पर है।

लिंक: hindwi.org/blogs/samaygho…
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समावर्तन पत्रिका के महाप्राण निराला पर केंद्रित अंक के रेखांकित में कुछ कविताएं समादृत निरंजन श्रोत्रिय जी की टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुई हैं।🌸

समावर्तन पत्रिका के महाप्राण निराला पर केंद्रित अंक के रेखांकित में कुछ कविताएं समादृत निरंजन श्रोत्रिय जी की टिप्पणी के साथ प्रकाशित हुई हैं।🌸
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मुझमें धीरे-धीरे उगता है एक पेड़ का असंगपन जिसे वहीं बने रहना है इतनी बड़ी दुनिया के सुनसान में घमासान में। * एक पहाड़ दूसरे पहाड़ की दृष्टि में बस पहाड़ हैं आदमी समतल से पहाड़ देखता है और पहाड़ से समतल ('एक अचानक के बीच':संग्रह जीवन राग की कविताएं) ~आदर्श भूषण adarsh bhushan

मुझमें धीरे-धीरे उगता है
एक पेड़ का असंगपन
जिसे वहीं बने रहना है
इतनी बड़ी दुनिया के सुनसान में
घमासान में।
*
एक पहाड़ दूसरे पहाड़ की दृष्टि में
बस पहाड़ हैं
आदमी समतल से पहाड़ देखता है
और पहाड़ से समतल

('एक अचानक के बीच':संग्रह
जीवन राग की कविताएं)

~आदर्श भूषण
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मुझमें धीरे-धीरे उगता है एक पेड़ का असंगपन जिसे वहीं बने रहना है इतनी बड़ी दुनिया के सुनसान में घमासान में। ('एक अचानक के बीच':संग्रह) ~आदर्श भूषण adarsh bhushan #WorldNatureConservationDay #विश्व_प्रकृति_संरक्षण_दिवस

मुझमें धीरे-धीरे उगता है
एक पेड़ का असंगपन
जिसे वहीं बने रहना है
इतनी बड़ी दुनिया के सुनसान में
घमासान में।

('एक अचानक के बीच':संग्रह)

~आदर्श भूषण
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#विश्व_प्रकृति_संरक्षण_दिवस
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हर आदमी के अंदर एक गाँव होता है जो शहर नहीं होना चाहता बाहर का भागता हुआ शहर अंदर के गाँव को बेढंगी से छूता रहता है जैसे उसने कभी गाँव देखा ही नहीं शहर हो चुका आदमी गाँव को कभी भूलता नहीं है बस किसी से कह नहीं पाता कि उसका गाँव बहुत दूर होता चला गया है उससे उसकी साँसों

हर आदमी के अंदर एक गाँव होता है 
जो शहर नहीं होना चाहता 
बाहर का भागता हुआ शहर 
अंदर के गाँव को बेढंगी से छूता रहता है 
जैसे उसने कभी गाँव देखा ही नहीं 

शहर हो चुका आदमी 
गाँव को कभी भूलता नहीं है 
बस किसी से कह नहीं पाता कि 
उसका गाँव बहुत दूर होता चला गया है उससे 
उसकी साँसों
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देवेश पथ सारिया जी ने ‘एक अचानक के बीच’ संग्रह की कविताओं पर एक सुंदर टीप लिखी है। सुंदर इसलिए कि इसमें सीखने की संभावनाओं की बात है और सुदिश की एक दिशा की ओर इशारा भी। उनका बहुत आभार। poemsindia.in/ek-achanak-ke-…

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"कविताओं को अपनी पीड़ा से फूटने और प्रस्तुत होने के लिए पहले किसी सघन में पकना होता है, एक अनियत और स्पष्ट घेराव में धीमी गति से हुँमसना होता है।" 【 hindwi.org/blogs/ganiteey… 】 #HindwiBlog #हिन्दवीब्लॉग #हिन्दवी #hindwi

"कविताओं को अपनी पीड़ा से फूटने और प्रस्तुत होने के लिए पहले किसी सघन में पकना होता है, एक अनियत और स्पष्ट घेराव में धीमी गति से हुँमसना होता है।"

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हर आदमी के अंदर एक गाँव होता है, जो शहर नहीं होना चाहता ! - आदर्श भूषण

हर आदमी के अंदर एक गाँव होता है,
जो शहर नहीं होना चाहता !

- आदर्श भूषण
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भूख की रात सबसे लंबी होती है और ग्लानि का दिन सबसे गर्म बिछोह की शाम सबसे ज़्यादा कोंचती है और बेगारी की सुबह सबसे ज़्यादा चुभती है ~ आदर्श भूषण adarsh bhushan

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भूख की रात सबसे लंबी होती है और ग्लानि का दिन सबसे गर्म बिछोह की शाम सबसे ज़्यादा कोंचती है और बेगारी की सुबह सबसे ज़्यादा चुभती है ~ आदर्श भूषण adarsh bhushan

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समतल समुद्र के पानी में आया नमक रात की बही हुई उदासी है नदियाँ मीठी इसलिए हैं क्योंकि उन्हें तटों के कन्धों का सहारा है सुख का गंतव्य दुःख में विलय है जैसे नदियाँ अपनी मिठास समुद्र के खारेपन में मिलने से नहीं बचा सकतीं समुद्र कहीं किसी कोने में जाकर नहीं गिरता पृथ्वी का कोई

समतल

समुद्र के पानी में आया नमक
रात की बही हुई उदासी है
नदियाँ मीठी इसलिए हैं
क्योंकि उन्हें तटों के कन्धों का सहारा है

सुख का गंतव्य दुःख में विलय है
जैसे नदियाँ अपनी मिठास 
समुद्र के खारेपन में मिलने से नहीं बचा सकतीं

समुद्र कहीं किसी कोने में जाकर नहीं गिरता
पृथ्वी का कोई
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बचेगा वही जो रचेगा ईश्वर की तरह नहीं मनुष्य की तरह पत्थर बींधते चाक घुमाते कलम चलाते उगाते धान पालते हुए गर्भ में एक नया प्राण /आदर्श भूषण Get your personalized bookmarks and art frames with your favorite poem/sher now. DM @rajatpalarts to order!

बचेगा वही
जो रचेगा
ईश्वर की तरह नहीं 
मनुष्य की तरह 
पत्थर बींधते 
चाक घुमाते 
कलम चलाते 
उगाते धान 
पालते हुए गर्भ में 
एक नया प्राण

/आदर्श भूषण 

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🎈🐘 उद्धरण: दीवार में एक खिड़की रहती थी — विनोद कुमार शुक्ल आर्ट: Khwaab Tanha #vinodkumarshukl #विकुशु #hindi #literarysocietyofmaths #hindikavita #theelephantwhisperers #elephant #deewarmeinekkhidkirahtithi

🎈🐘

उद्धरण: दीवार में एक खिड़की रहती थी — विनोद कुमार शुक्ल
आर्ट: <a href="/KhwaabTanha/">Khwaab Tanha</a>

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