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مرزا

@iammirza_

ID: 532270084

calendar_today21-03-2012 14:27:25

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कितने झूठे थे हम मोहब्बत में; तुम भी जिंदा हो, हम भी जिंदा हैं।

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मेरी वे सभी प्रेमिकाएँ जो मुझसे दूर चली गईं, जिन्हें मेरी बातें किताबी लगती थीं, जो कहती थीं कि जीवन गुज़रते रहना ही प्रेम है, जो मेरे भावों को प्रैक्टिकलिटी का लिहाफ़ ओढ़ाना चाहतीं थीं, मैं उन सभी से कहना चाहता हूँ कि मैं आज भी जिंदा हूँ!

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मोहल्ले के आख़िरी मकान में आठ बरस की राबिया खिड़की से झाँकती अब दिखाई नही देती, पुराने रिन्द अब मयकशी छोड़ आगे बढ़ गए हैं, कौन हाथ सेंकता है अलाव में अब, वक़्त जैसे ठहर गया है, नया कुछ भी नहीं है ; तुम भी तो नहीं हो!

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अपना लड़ना भी मोहब्बत है तुम्हें इल्म नहीं चीख़ती तुम रही और मेरा गला बैठ गया..!! -तहज़ीब हाफ़ी

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लड़कियां इश्क़ में कितनी पागल होती है, फोन बजा और चूल्हा जलता छोड़ दिया। बस कानों पर हाथ रक्खे थे थोड़ी देर, और फिर उस आवाज़ ने पीछा छोड़ दिया। तुम क्या जानो उस दरिया पर क्या गुज़री, तुमने तो बस पानी भरना छोड़ दिया। (तहज़ीब हाफ़ी)

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दे मुझको शिकायत की इज़ाज़त कि सितमगर, कुछ तुझको मज़ा भी मेरे आज़ार में आवे..!! -मिर्ज़ा नोशा

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सपनों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इन्हें हम सामूहिक रूप से नहीं देख पाते। -अशोक वाजपेयी

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फ़िलवक्त के लिए फ़ैज़ साब... आए तो यूं कि जैसे हमेशा थे मेहरबां, भूले तो यूं कि जैसे कभी आश्ना न थे।

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दी शब-ए-वस्ल मोअज़्ज़िन ने अज़ाँ पिछली रात, हाए कम-बख़्त को किस वक़्त ख़ुदा याद आया..!! (मिर्ज़ा दाग़)

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होश ओ हवास ओ ताब ओ तवाँ 'दाग़' जा चुके अब हम भी जाने वाले हैं सामान तो गया..!!

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तुम नहीं हो, मैं अकेला हूँ मगर वह तुम्ही हो जो टूटती तलवार की झंकार में या भीड़ की जयकार में या मौत के सुनसान हाहाकार में फिर गूंज जाती हो। (धर्मवीर भारती)

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जो लोग सवाल नहीं उठाते वे पाखंडी हैं। जो सवाल नहीं कर सकते वे मूर्ख हैं। जिनके ज़हन में सवाल उभरता ही नहीं वे ग़ुलाम हैं। ~ जॉर्ज गॉर्डन बायरन

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लीजिए सुनिए अब अफ़साना-ए-फ़ुर्क़त मुझ से, आप ने याद दिलाया तो मुझे याद आया...!! -दाग़

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सिर्फ अपना ख़याल रखना था ये भी ना हो सका हम से। -जौन

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जिन्हें दिखता नहीं उन्हें कोई रास्ता नहीं सूझता जो लंगड़े हैं वे कहीं नहीं पहुँच पाते जो बहरे हैं वे जीवन की आहट नहीं सुन पाते बेघर कोई घर नहीं बनाते जो पागल हैं वे जान नहीं पाते कि उन्हें क्या चाहिए। यह ऐसा समय है जब कोई हो सकता है अंधा लंगड़ा बहरा बेघर पागल । -मंगलेश डबराल

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हुज़ूर छोड़िए हमें हज़ार और रोग हैं, हुज़ूर जाइए कि हम बहुत ग़रीब लोग हैं। -फ़राज़

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कोई क्यूँ किसी का लुभाए दिल कोई क्या किसी से लगाए दिल, वो जो बेचते थे दवा-ए-दिल वो दुकान अपनी बढ़ा गए। - ज़फर

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करीब और भी आओ की शौक-ए-दीद मिटे शराब और पिलाओ की कुछ नशा उतरे।

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कामुकता का श्रृंगार ओढ़े पीड़ा की गाथाएं सुनाती स्त्रियां लिबास उतर जाने पर भी नग्न नहीं होतीं, नंगे होते पुरुष बचाते हैं अपनी आबरू निढाल होके उनके स्तनों पर।