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Dreamer

@hindinomics

हम आखों में समंदर लिए फिरते हैं, जाने क्या क्या अंदर लिए फिरते हैं। A citizen with dreams. Writing my thoughts. #copywright protected.

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calendar_today23-01-2018 14:57:12

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तुम्हारे इंतज़ार में, तुम्हारे ही खुमार में, हम जागते हैं रात भर न जाने किस की आस में, न बदन की हमको जुस्तुजू, न कोई रोग प्यार में, बस देख ले तुम्हे आंख भर, जीएंगे तुम्हारे ख्वाब में, मौत से भी गिला नहीं गर गुज़र जाए ज़िंदगी तुम्हारे इंतज़ार में।

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तबियत नासाज़ थी, अब ठीक है तुम्हारे आने के बाद, बेचैनी बेइंतिहा थी, अब ठीक है तुम्हारे आने के बाद, ख्याल बेशुमार थे, अब ठीक है तुम्हारे आने के बाद, मैं कुछ और था, अब कुछ और हूं तुम्हारे आने के बाद।

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पहले खुद पर, अब सितारों पर यकीन है, जिंदगी कई बरसों गर्दिश में गुज़र की है, जिन्हें दोस्त कहते थे हम बड़े गुमान से, उन्होंने बताया की हमने बड़ी भूल की है, मासूम हम भी कम नहीं थे इस बाज़ार में, जेब में पैसा नहीं और खिलौने की चाहत की है।

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कभी आसमां कभी जमीं पर हूं, मैं आज कल उनकी सोच में हूं, सोचता कुछ करता कुछ और हूं, क्या कहूं मैं किसकी गिरफ्त में हूं, इस हाल में, उनके ख्याल में हूं, एक सवाल हू, जवाब की तलाश में हूं।

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काम कुछ ऐसा करो की आसमां भी झुक जाए, तुम्हारी जीत इतनी शानदार हो की हर आंख नम हो जाए, जिधर से तुम निकलो, वो रास्ता तुम्हारे नाम हो जाए, और बुलंदी इतनी हो, की बच्चो के नाम तुम्हारे नाम पर हो जाए।

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हादसे हमारे साथ कुछ ऐसे हुए, हमारा कत्ल हुआ और हम ही क़ातिल हुए।

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क्या कहें क्या क्या न हुआ रात भर, बेइंतहा रहा सुबह का इंतज़ार रात भर, इस कदर तन्हाइयों ने घेरा हमको रात भर, खुदी से डरने लगे हम रात भर, दरवाज़ा घर का खुला रखते हैं रात भर, तुम चौखट पे न इंतज़ार करो रात भर, न नींद आई, न तुम आए, बस याद आई रात भर।

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नए ज़माने में वो पुराना इश्क कर बैठी, कोई समझाओ वो कैसा गुनाह कर बैठी, अब तो रिश्ता बस पल दो पल का है, वो तमाम उम्र उसके नाम कर बैठी, अब आग तो सिर्फ बदन की बची है, वो चूल्हे की आग पर उंगली जला बैठी, ये कैसा गुनाह कर बैठी.. पुराना इश्क कर बैठी।

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सबको सफर करना है तय कहीं न कहीं, कुछ देर आओ ठहर जाए कहीं न कहीं, बिछड़ भी गए तो मिलेंगे तुमसे कहीं न कहीं, इस जहां के पार जहां और भी हैं कहीं न कहीं, हमारे निशान छुपा के रखना कहीं न कहीं, बिछड़ भी गए तो मिलेंगे तुमसे...

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तुमने ठुकराया तो ख़ुद से मिल पाए हम, कभी कुछ खोना भी मिलने का सबब होता है।

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अजब दौर से गुज़र रही है ज़िंदगी, जिंदा रहने की चाह में रोज़ मर रहे हैं, जिनके वास्ते सब कुछ लुटा बैठे हम, वही हमसे ज़िंदगी का हिसाब मांग रहे हैं।

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कल की आस में आज भी गवां बैठे, दोस्तों की महफ़िल छोड़ दुश्मनों में आ बैठे, जिनको दी थी हमने अपने घर की चाभी, वही उसे लूटने के वास्ते पहली सफ़ में आ बैठे।

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जब तरसे तो तेरा प्यार समझ में आया, इतना भटके की घर समझ में आया।

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अहसास किसी के गुजरने का कब तक रहे, है हर सुबह के बाद शाम पर शाम कब तक रहे, सभी मसरूफ़ है अपनी जिंदगी के सफ़र में, है अभी सभी का साथ, पर ये साथ कब तक रहे।

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वो हमारी हस्ती मिटाने में लगे हैं, हमारा शौक देखिए उन्हीं से दिल लगाने में लगे हैं।

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हर दर्द अब अपना सा लगने लगा है खुशी को गुज़रे एक अरसा सा लगने लगा है हम चाहते हैं की वो समझ जाए हमें इतनी सी ख्वाइश भी सपना सा लगने लगा है कहां जाए,किस्से मिले,किस्से कहे अपना हाल हमारा शहर भी अब बेगाना सा लगने लगा है शोर इस कदर बस गया है चारों ओर खामोशी में अब डर सा लगने लगा है