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देवराज मिश्र

@deorajmishra9

राष्ट्रीय कवि, लेखक, पत्रकार

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calendar_today31-05-2018 20:02:17

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तिरछे तीर ... एक और एक से दो बने, शुद्ध गणित कहलाय । और एक अरु एक मिलि, जब ग्यारह बनि जाय । जब ग्यारह बनि जाय, भाय संगठन हो जाता । एक - एक मिल भी रहे एक, तो प्रेम कहाता । 'देवराज' कूटनीति कहाये, मिलें न एक से एक । राजनीति कही जायेगी, जब एक विरुद्ध हो एक ।...

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तिरछे तीर ... कहते थे जो नाज़ से, उठा नहीं तूफ़ान । डिगा सके जो हौसले, व उनके अरमान । व उनके अरमान, तान थी कुटिल कसैली । रीति - नीति - परतीति, सदा ही रही विषैली । 'देवराज' देखा उन्हें, नाली सम बहते । हम सागर हैं घमंड से, थे जो अक़्सर कहते ।...

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तिरछे तीर ... जातिवाद की डगर पर, अज़ब सियासी वीर । सत्ता हित के हेतु ही, खींचते कुटिल लकीर । खींचते कुटिल लकीर, पीर जनता को होती । इनके पापों की गठरी, बरसों तक ढोती । 'देवराज' होते गज़ब, कलुषित - क्रूर - विवाद । राज़नीति में कोढ़ सा, जब से बढ़ा जातिवाद ।...

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तिरछे तीर ... बात स्वमन की हो रही, हैं नकली जज़्बात । और अहर्निंश कर रहे, हिन्दू हित से घात । हिन्दू हित से घात, रात को दिन बतलाते । अपने मुंह अपनी करनी, कह नहीं अघाते । 'देवराज' सामान्य पर, करें जो नित आघात । उन्हें पड़ेगी लात जब , तभी बनेगी बात ।...

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तिरछे तीर ... गरम चाय से भी अधिक, कुटिल केतली आज़ । मन्सूबों पर स्वयं के, उसे अज़ब है नाज़ । उसे अज़ब है नाज़, साज़ काल्पनिक सजाती । और चाय को घुमा के, सुबह ओ शाम नचाती । 'देवराज' नेता भले, अक्सर मिलें नरम । मगर सियासी करछुले, रहते सदा गरम ।...

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तिरछे तीर ... धर्म द्रोहियों से रहें, सदैव ही सावधान करना होगा शीघ्र ही, इनका भी समाधान इनका भी समाधान, हिन्दुओं को जो बाटें सात समन्दर पार, चौधरी की नित चाटें 'देवराज' रिपु राष्ट्रवाद के, करते कुत्सित कर्म वहिष्कार के योग्य हैं, बांटना जिनका धर्म

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तिरछे तीर ... पस्त अमेरिका हो गया, सका न युद्ध को खींच शर्तों पर ईरान से, पाकिस्तान के बीच पाकिस्तान के बीच, कीच से कीच धुलेगा पाकपरस्त गेंदा - गुड़हल, अब गज़ब खिलेगा 'देवराज' अपनी चालों में, फादरलैंड भी मस्त अज़ब किनारे रह गये, साहेब होकर पस्त

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तिरछे तीर ... जातिवाद की रार में, लिप्त अगर दरबार तो निश्चित है जनतंत्र की, दुर्गति - बंटाधार दुर्गति - बंटाधार, वार तब कलुषित होंगे ढपली अपनी - अपनी, बजायेंगे जब चोंगे 'देवराज' घातक सदा, कुत्सित कुटिल विवाद द्रोहकाल राजनीति का, होता है जातिवाद

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तिरछे तीर ... राजनीति में हो गयी, भांडों की भरमार कुछ तो नेता हो गये, कुछ करते परचार कुछ करते परचार, चार चमचों संग मिलकर मटक रहा हो जंगल में, ज्यों गेंदा खिलकर 'देवराज' करें बांटने वाली, घृणित घिनौनी नीति फ़िल्म समझते देश को, अज़ब गज़ब राजनीति

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तिरछे तीर ... सोच रही अब लेखनी, पड़ी मैं किसके हाथ । दरबारों में झुक रहा, अक़्सर जिसका माथ । अक़्सर जिसका माथ, साथ मुझे रास न आया । राज़नीति की राहों पर, बदनाम कराया । 'देवराज' मतिभ्रम हुआ, अथवा मगज़ में मोच । मर्माहत होकर अज़ब, क़लम अब रही सोच ।...

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तिरछे तीर ... साज़ सज़ायें उस जगह, मिले जहां सम्मान । आदर उसका कीजिये, रखिये दिल से मान । रखिये दिल से मान, मगर उस जगह पे रुकिये । देखि हैसियत बड़ी, कहीं पर भी मत झुकिये । 'देवराज' कायरता है जी, हर दर झुकना आज़ । संस्कार की चौखट पर झुक, सदा सज़ायें साज़ ।...

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तिरछे तीर ... बांट रहा हिन्दुओं को, वह नित बारम्बार छीन रहा सामान्य के, अब सारे अधिकार अब सारे अधिकार, वार कटु कुत्सित करता हरी झोलियां हिन्दू टैक्स से, जम कर भरता 'देवराज' अन्धभक्त जी, फ़िर भी रहे हैं चाट उसी की जो रहा धीरे - धीरे, बारी - बारी बांट

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तिरछे तीर ... घातक होती जा रही, भारतीय राजनीति । दरबारों में हो रही, कुत्सित कुटिल कुनीति । कुत्सित कुटिल कुनीति,भीति जनता पर भारी । अज़ब गज़ब लगती, सिंहासन की लाचारी । 'देवराज' तारीखों में, कहलायेंगे पातक । घृणित सियासत कर रहे, साहेब जो घातक ।...

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तिरछे तीर ... रंग चमचई का दिखा, अज़ब देश में आज़ । बाबा साहब की कृपा, से ही पाया ताज़ । से ही पाया ताज़, राज़ की बात बताते । लहालोट साहेब जी, चरणों में हो जाते । 'देवराज' सुन देख कर, जन गण मन है दंग । राष्ट्रपति पद लोभ में, गज़ब सियासी रंग ।...

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तिरछे तीर ... फ़ेल साहिबी हो गयी, सुना संसद के बीच जन गण मन सब समझता, रहा कौन कब खींच रहा कौन कब खींच, नीचता ज़टिल दिखाता धीरे - धीरे हाशिये पर, सामान्य को लाता 'देवराज' जो नित्य खेलते, कुटिल सियासी खेल उन्हें कर्म फल मिलेंगे, होंगे सदैव फ़ेल

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तिरछे तीर ... जाति बताते फ़िर रहे, सुना अब चौकीदार । कल थे संग हिन्दुओं के, धरम के पैरोकार । धरम के पैरोकार, प्यार तज़ि रार बढ़ाते । तुष्टिकरण टोपियों का, तो कभी दलित कहाते । 'देवराज' आज़ स्वयं की, करके विविध प्रजाति । खाज़ सियासी अति विकट, बने अति पिछड़ी जाति ।...

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तिरछे तीर ... गगरी में गुड़ फोड़ना, शायद अच्छी बात । मगर सियासत में यही, सिल - बट्टे से घात । सिल - बट्टे से घात, फूट सकती है गगरी । राज़ समझ जायेगी गुड़ का, सगरी नगरी । 'देवराज' है उचित नहिं, रातिब रगरा रगरी । आखिर कब तक सहेगी, माटी की गगरी ।... देवराज मिश्र ... ✍️

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तिरछे तीर ... राज धर्म मृतप्राय है, नेता कथित महान । कुटिल कर्म हैं कंस के, जाने सकल जहान । जाने सकल जहान, शान कायम ही रहती । मौज करें महाराज, दर्द जनता सब सहती । 'देवराज' जब करेंगे, जन गण मन के काज । तभी सुरक्षित रहेंगें, ताज, आप अरु राज ।... देवराज मिश्र ... ✍️

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मारे जाते रहोगे, अगर न जागे आज़ सदियों तक यूं गिरेगी, तुम पर कुत्सित गाज़ तुम पर कुत्सित गाज़, साज़ यूं ही उजड़ेगा बिगड़ा सदा तुम्हारा, आगे भी बिगड़ेगा 'देवराज' इस कायर निद्रा, के कारण तुम हारे जागो शस्त्र गहो वरना, यूं ही जाओगे मारे

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राजनीति जब धूर्तनीति बन, शासन पर छा जाती है । राष्ट्रवाद के चोले में जब, मक्कारी आ जाती है । अदालतें भी बोझ तले जब, सिक्कों के दब जाती हैं । विचारधारा सनातनी जब, जुमलों तक रह जाती है । 'देवराज' सत्ता मद में, सरकारें पगला जाती हैं । तो याद रहे भूखी जनता, सिंहासन तक खा जाती है ।...