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रावण

@dashanan_

शम्भो!

ID: 2937330697

calendar_today20-12-2014 16:35:51

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एक महीना अभी कल ही बीता एक साल अभी कल ही बीता इस बीतने में बहुत कुछ बीता जीवन का एक अंश– बड़ा या छोटा, ठीक ठीक नहीं कह सकता बीत जाने से क्या-क्या बदला कह नहीं सकता मौसम हर बरस जैसा ही दीवार पर लगे पुराने कैलेंडर की जगह नया आ गया उस बीते हुए की जगह नया साल आ गया – नया साल

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मेरे अँधेरे में कही न कहीं एक धीमा सा दिया जलता रहता है । उसकी लौ कभी एक सिफ़र में सिमट जाती है,कभी एक सुई में, और कभी एक नन्हें से साँप की तरह नाचना शुरू कर देती है और मैं घबरा उठता हूँ कि अब यह दिया बुझ जाएगा । — केबी | ख़्वाब है दीवाने का

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जिन्हें पांच साल के लिये चुन लिया उन्होंने अपने को ही देश मान लिया। वे मुंह खोलकर अपने भीतर वैसे ही भारत को बताने लगे, जैसे कृष्ण ने अर्जुन को अपने मुंह में सारा ब्रह्माण्ड दिखाया था। – परसाई

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मैं अक्सर सोचता हूँ कि वे शहर कितने दुर्भाग हैं, जिनके अपने कोई खँडहर नहीं। उनमें रहना उतना ही भयानक अनुभव हो सकता है, जैसे किसी ऐसे व्यक्ति से मिलना, जो अपनी स्मृति खो चुका है, जिसका कोई अतीत नहीं। – निर्मल वर्मा

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वे जाल नहीं बुनते बस जल कम करते जाते हैं बाद इसके जब तुम तड़पते हो गर्म रेत पर वे तुम्हारी विपत्तियों का मज़ा लेते हैं और जब तुम नहीं रहते तब तुम उनके और भी काम के हो जाते हो। — अविनाश मिश्र

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बचपन में किसी वृक्ष-मित्र ने कहा था देखो हम कितने हैं, कितनी पत्तियां हैं! पत्तियों की जगह लेखक के शब्दों को रख लेना शाखाओं की जगह पुस्तकें.. फिर चुप से चल देना। — अनिरुद्ध उमठ

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पहुँचा हुजूर-ए-शाह हर एक रंग का फ़क़ीर, पहुँचा नहीं जो, था वही पहुँचा हुआ फ़क़ीर.. — शुजा ख़ावर

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कश्चित् कस्यचिन्मित्रं, न कश्चित् कस्यचित् रिपु:। अर्थतस्तु निबध्यन्ते, मित्राणि रिपवस्तथा॥ #नीति #सुप्रभात

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जब भगत सिंह फाँसी के तख़्ते की ओर बढ़े तो अहिंसा ही थी उनका सबसे मुश्किल सरोकार अगर उन्हें क़बूल होता युद्ध सरदारों का न्याय तो वे भी जीवित रह लेते बर्दाश्त कर लेते धीरे-धीरे उजड़ते रोज़ मरते हुए लाहौर की तरह बनारस अमृतसर लखनऊ इलाहाबाद कानपुर और श्रीनगर की तरह। — आलोकधन्वा

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कुछ ऐसी बात न थी तुझसे दूर हो जाना, ये बात अलग है कि रह-रह के दर्द होता था.. — फ़िराक़ गोरखपुरी

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उजले उजले से कफ़न में सहर ए हिज्र ‘फ़िराक़’, एक तस्वीर हूँ मैं रात के कट जाने की! — फ़िराक़ गोरखपुरी

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एक उम्र में यह विचार ही बहुत रुआँसा लगता है कि कोई ख़ाली-खाली-सा होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा हो... एक संग बहुत सुख-सा भी होता है- बाद में।... और यह असम्भव-सा लगता है कि जिस घड़ी तुम सो रहे हो उस घड़ी कोई तुम्हारी बाट जोह रहा हो... वे दिन | निर्मल वर्मा

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सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज। अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः॥ श्रीमद्भगवद्गीता. अध्याय 18, श्लोक 66. अर्थात सब धर्मों को त्यागकर केवल मेरी शरण में आ जाओ. मैं तुम्हें सभी पापों से मुक्त कर दूँगा, शोक मत करो.