Trilok Singh Thakurela त्रिलोक सिंह ठकुरेला (@trilokthakurela) 's Twitter Profile
Trilok Singh Thakurela त्रिलोक सिंह ठकुरेला

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#साहित्यकार

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calendar_today01-10-2023 16:22:41

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#सागर घन बनते रहे, और शिलाएँ रेत । चिरस्थायी कुछ नहीं, समय करे संकेत ।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #विश्व_महासागर_दिवस 🌊 #लेखनी✍️

#सागर घन बनते रहे, और शिलाएँ रेत । 
चिरस्थायी कुछ नहीं, समय  करे संकेत ।। 

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#विश्व_महासागर_दिवस 🌊
#लेखनी✍️
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जो समर्थ उसके लिए, अगम कौन सी बात। खारे #सागर से करे, सूरज मृदु बरसात।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #लेखनी✍️ #दोहा

जो समर्थ उसके लिए, अगम कौन सी बात।
खारे #सागर से करे, सूरज मृदु बरसात।। 

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
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छाये रावण हर तरफ, फिर आओ श्री राम। व्याकुल है दुःख से धरा, सिसक रही अविराम।। सिसक रही अविराम ,हो गयी मैली गंगा। दानव हुए दबंग, रात-दिन करते दंगा। 'ठकुरेला' कविराय, कर्म शुभ सभी भुलाये। राम चलाओ बाण, मिटें ये रावण छाये।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #कुण्डलियाँ #लेखनी Trilok Singh Thakurela त्रिलोक सिंह ठकुरेला

छाये रावण हर तरफ, फिर आओ श्री राम।
व्याकुल है दुःख से धरा, सिसक रही अविराम।।
सिसक रही अविराम ,हो गयी मैली गंगा।
दानव हुए दबंग, रात-दिन करते दंगा।
'ठकुरेला' कविराय, कर्म शुभ सभी भुलाये।
राम चलाओ बाण, मिटें ये रावण छाये।।

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#कुण्डलियाँ #लेखनी
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ताली बजती है तभी, जब मिलते दो हाथ। एक एक ग्यारह बनें, अगर खड़े हों #साथ।। अगर खड़े हों साथ, अधिक ही ताकत होती। बनता सुन्दर हार, मिलें जब धागा, मोती। ‘ठकुरेला’ कविराय, सुखी हो जाता माली। खिलते फूल अनेक, खुशी में बजती ताली।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #साथ #लेखनी ✍️

ताली बजती है तभी, जब मिलते दो हाथ।
एक एक ग्यारह बनें, अगर खड़े हों #साथ।।
अगर खड़े हों साथ, अधिक ही ताकत होती।
बनता सुन्दर हार, मिलें जब धागा, मोती।
‘ठकुरेला’ कविराय, सुखी हो जाता माली।
खिलते फूल अनेक, खुशी में बजती ताली।। 

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#साथ  #लेखनी ✍️
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बलशाली के हाथ में, बल पाते हैं अस्त्र। कायर के संग #साथ में, अर्थहीन सब शस्त्र।। अर्थहीन सब शस्त्र, तीर, तलवार, कटारी। बरछी, भाला, तोप, गदा, बन्दूक, दुधारी। ‘ठकुरेला’ कविराय, बाग का बल ज्यों माली। हथियारों का मान, बढ़ाता है बलशाली।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #साथ #लेखनी ✍️

बलशाली के हाथ में, बल पाते हैं अस्त्र।
कायर के संग #साथ में, अर्थहीन सब शस्त्र।।
अर्थहीन सब शस्त्र, तीर, तलवार, कटारी।
बरछी, भाला, तोप, गदा, बन्दूक, दुधारी।
‘ठकुरेला’ कविराय, बाग का बल ज्यों माली।
हथियारों का मान, बढ़ाता है बलशाली।। 

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#साथ  #लेखनी ✍️
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ममता की मंदाकिनी, बहती माँ के पास । होता माँ के #साथ में, सुख का ही अहसास । सुख का ही अहसास, विघ्न छू-मंतर होते । माँ के मीठे बोल, बीज सुख के ही बोते । ‘ठकुरेला’ कविराय, किसी से हुई न समता। जग में रही अमूल्य, सदा ही माँ की ममता।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #साथ #लेखनी ✍️

ममता की मंदाकिनी, बहती माँ के पास ।
होता माँ के #साथ में, सुख का ही अहसास ।
सुख का ही अहसास, विघ्न छू-मंतर होते ।
माँ के मीठे बोल, बीज सुख के ही बोते ।
‘ठकुरेला’ कविराय, किसी से हुई न समता।
जग में रही अमूल्य, सदा ही माँ की ममता।।

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#साथ  #लेखनी ✍️
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परछाई सी कर्म-गति, हर पल रहती #साथ। जीव बैल की नाक सा, कर्म नाक की नाथ।। कर्म नाक की नाथ, नियंत्रण अपना रखता। जैसा करता कर्म, व्यक्ति वैसा फल चखता। ‘ठकुरेला’ कविराय, शास्त्र बतलाते, भाई। बन जाती प्रारब्ध, कर्म की यह परछाई।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #साथ #लेखनी ✍️

परछाई सी कर्म-गति, हर पल रहती #साथ।
जीव बैल की नाक सा, कर्म नाक की नाथ।।
कर्म नाक की नाथ, नियंत्रण अपना रखता।
जैसा करता कर्म, व्यक्ति वैसा फल चखता।
‘ठकुरेला’ कविराय, शास्त्र बतलाते, भाई।
बन जाती प्रारब्ध, कर्म की यह परछाई।।

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#साथ  #लेखनी ✍️
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गाँव-गाँव और नगर-नगर। गली-गली और डगर-डगर॥ चलो, सभी मिलकर जायें। मिलकर सबको समझायें॥ अनपढ़ रहना ठीक नहीं। अनपढ़ की कब पूछ कहीं॥ जो अनपढ़ रह जाता है। जीवन भर पछताता है॥ ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #शिक्षा 📚 #लेखनी ✍️ Trilok Singh Thakurela त्रिलोक सिंह ठकुरेला

गाँव-गाँव और नगर-नगर।
गली-गली और डगर-डगर॥
चलो, सभी मिलकर जायें।
मिलकर सबको समझायें॥

अनपढ़ रहना ठीक नहीं।
अनपढ़ की कब पूछ कहीं॥
जो अनपढ़ रह जाता है।
जीवन भर पछताता है॥

~  त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#शिक्षा 📚  #लेखनी ✍️
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Narpati C Pareek 🇮🇳 Arti Singh Trilok Singh Thakurela त्रिलोक सिंह ठकुरेला Shweta Jha Archana Sharma Margret. Alok Ranjan Srivastav Arun Kumar Kuldip Mengi Baaten साहित्य की सन्तोष 'एहसास' Geeta Natha मधूलिका सिंह sirOne. Yasmeen khan🌸 Malti Vishwakarma डॉ.पूजा अमित🇮🇳 Vinesh Gaba Vikas soni arrora 🇮🇳 Sunita Yadav Arvind Kr Yadav विजय नगरकर Vijay Nagarkar Manoj Kanaujia (Rajak) Dhirendra Mishra #काव्य_कृति✍️ Peetamber meena former Crpf जिसने झेली दासता, उसको ही पहचान। कितनी पीड़ा झेलकर, कटते हैं दिनमान॥ कटते हैं दिनमान, मान मर्यादा खोकर। कब होते खग मुग्ध, स्वर्ण -पिंजरे में सोकर। 'ठकुरेला' कविराय, गुलामी चाही किसने। जीवन लगा कलंक, दासता झेली जिसने॥ #त्रिलोक_सिंह_ठकुरेला #जन्मदिन 💐 #लेखनी ✍️

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कितनी पीड़ा झेलकर, कटते हैं दिनमान॥
कटते हैं दिनमान, मान मर्यादा खोकर।
कब होते खग मुग्ध, स्वर्ण -पिंजरे में सोकर।
'ठकुरेला' कविराय, गुलामी चाही किसने।
जीवन लगा कलंक, दासता झेली जिसने॥

#त्रिलोक_सिंह_ठकुरेला
#जन्मदिन 💐  #लेखनी ✍️
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कुण्डलिया... चलते चलते एक दिन, तट पर लगती नाव। मिल जाता है सब उसे, हो जिसके मन चाव।। हो जिसके मन चाव, कोशिशें सफल करातीं। लगे रहो अविराम, सभी निधि दौड़ी आतीं। ‘ठकुरेला’ कविराय, आलसी निज कर मलते। पा लेते गंतव्य, सुधीजन चलते चलते।। -- त्रिलोक सिंह ठकुरेला #कुण्डलिया_दिवस

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कुण्डलिया... सोना तपता आग में और निखरता रूप। कभी न रुकते साहसी, छाया हो या धूप।। छाया हो या धूप, बहुत सी बाधा आयें। कभी न बनें अधीर, नहीं मन में घबरायें। ‘ठकुरेला’ कविराय, दुखों से कभी न रोना। निखरे सहकर कष्ट, आदमी हो या सोना।। -- त्रिलोक सिंह ठकुरेला #कुण्डलिया_दिवस

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कुण्डलिया... दासी वाला संत हो, खाँसी वाला चोर। समझो दोनों जा रहे, बर्बादी की ओर।। बर्बादी की ओर, समझिये किस्मत खोटी। हँसी बिगाड़े प्यार, स्वास्थ्य को बासी रोटी। ‘ठकुरेला’ कविराय, हरे उत्साह उदासी। होता बड़ा अनर्थ, अगर मुँहफट हो दासी।। -- त्रिलोक सिंह ठकुरेला #कुण्डलिया_दिवस

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कुण्डलिया... तन का आकर्षण रहा, बस यौवन पर्यन्त। मन की सुंदरता भली, कभी न होता अंत।। कभी न होता अंत, सुशोभित जीवन करती। इसकी मोहक गंध, सभी में खुशियाँ भरती। ‘ठकुरेला’ कविराय, मूल्य है सुन्दर मन का। रहता है दिन चार, मित्र आकर्षण तन का।। -- त्रिलोक सिंह ठकुरेला #कुण्डलिया_दिवस

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मिलते हैं हर एक को, #अवसर सौ-सौ बार। चाहे उन्हें भुनाइये, या कर दो बेकार।। या कर दो बेकार, समय को देखो जाते। पर ऐसा कर लोग, फिरें फिर फिर पछताते। ‘ठकुरेला’ कविराय, फूल मेहनत के खिलते। जीवन में बहु बार, सभी को अवसर मिलते।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #अवसर #लेखनी ✍️ #कुण्डलिया

मिलते हैं हर एक को, #अवसर सौ-सौ बार।
चाहे उन्हें भुनाइये, या कर दो बेकार।।
या कर दो बेकार, समय को देखो जाते।
पर ऐसा कर लोग, फिरें फिर फिर पछताते।
‘ठकुरेला’ कविराय, फूल मेहनत के खिलते।
जीवन में बहु बार, सभी को अवसर मिलते।।

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#अवसर  #लेखनी ✍️
#कुण्डलिया
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बेटी भी कमतर नहीं, और न बेटा हेय। अलग अलग दोनों लिए, गरिमा, मान, प्रदेय ।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #राष्ट्रीय_बालिका_दिवस 👸 #लेखनी ✍️

बेटी भी कमतर नहीं, और न बेटा हेय।
अलग अलग दोनों लिए,  गरिमा, मान, प्रदेय ।।

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#राष्ट्रीय_बालिका_दिवस 👸
#लेखनी ✍️
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फल, छाया, लकड़ी, दवा, फूल, सुगन्धित इत्र। रह अलोभ उपकृत करें, वृक्ष अनोखे मित्र।। ~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला #विश्व_पर्यावरण_दिवस 🌱🌿 #लेखनी ✍️

फल, छाया, लकड़ी, दवा, फूल, सुगन्धित इत्र। 
रह अलोभ उपकृत करें, वृक्ष  अनोखे मित्र।। 

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
#विश्व_पर्यावरण_दिवस 🌱🌿
#लेखनी ✍️