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वीणावादिनी वाणी

@vinavadinivani

प्रत्येक शब्द जो मेरे कंठ से निकले...वो शब्द मां आपका हो🙇🏻‍♀️🌼

ID: 1900178624428253184

calendar_today13-03-2025 13:36:27

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जो बुद्धि जीवी कहते है...#भक्ति करने से , #श्रीमद्भागवतगीता व #वेद पढ़ने से क्या होगा ? सुनीता विलियम: #हिन्दू विरासत की सराहना करती हूं, जहां मैं जाती हूं #गणेशजी की प्रतिमा संग लेकर जाती हूं। अंतरिक्ष में भी मैं #वेद व भगवतगीता की प्रतियों के संग #गणेशजी की प्रतिमा भी लेकर गई।

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#रामायण #SHREERAMA ये चलचित्र उनके लिए जो कहते हैं कि रावण चरित्रवान था, उसने माता सीता को स्पर्श तक नहीं किया। इस कारण उसने माता सीता को स्पर्श नहीं किया👇🏻 #SiyaKeRam

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वास्तविकता में #Ramayana के मात्र 6 कांड ही है, सातवें (#उत्तरकांड) का कोई उल्लेख नहीं है। जिससे यह भी सिद्ध होता है कि #श्रीराम ने #मातासीता को अपने जीवन तथा राज्य से निष्कासित नहीं किया था।

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तमस हटे भीतर का, चेतना प्रकाशित हो। अंतर मन के द्वार पर, सत्य ज्योति विराजित हो।

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अंतर मन के द्वार पर, सत्य ज्योति विराजित हो।
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हे वीर! जो तुझे विकल करे, वह विचार ही व्यर्थ है। क्षणिक सुख-दुख की लहरों में डगमगाना अर्थहीन अर्थ है।। धैर्य धर, आत्मस्वरूप को पहचान। मिथ्या प्रपंच से परे है तेरा परम स्थान।। #जय_श्री_कृष्ण

हे वीर! जो तुझे विकल करे, वह विचार ही व्यर्थ है।
क्षणिक सुख-दुख की लहरों में डगमगाना अर्थहीन अर्थ है।।
धैर्य धर, आत्मस्वरूप को पहचान।
मिथ्या प्रपंच से परे है तेरा परम स्थान।। #जय_श्री_कृष्ण
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सुनो पार्थ! धर्मार्थ युद्धध्वनि जब गगन गुंजित करती है, विजय स्वयं शरण में आ, धर्मवीर को वंदित करती है। शस्त्रधारी धर्मपथगामी सदा विजयी कहाए जाते है, केशव संग जो चले, उसे कौन पराजित कर पाते है। #जय_श्री_कृष्ण

सुनो पार्थ!
धर्मार्थ युद्धध्वनि जब गगन गुंजित करती है,
विजय स्वयं शरण में आ, धर्मवीर को वंदित करती है।
शस्त्रधारी धर्मपथगामी सदा विजयी कहाए जाते है,
केशव संग जो चले, उसे कौन पराजित कर पाते है। #जय_श्री_कृष्ण
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वैराग्य ही वह दीपक है...जो भीतर के तमस को मिटा, आत्मदीप प्रज्ज्वलित करता है।🌟 #SanatanDharma

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जब पूर्ण समर्पण न हो, तब मन में अत्यधिक आकांक्षाएँ होती है तथा मन भ्रमित ही रहता है।

जब पूर्ण समर्पण न हो, तब मन में अत्यधिक आकांक्षाएँ  होती है तथा मन भ्रमित ही रहता है।
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उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत। क्षुरस्य धारा निशिता दुरत्यया दुर्गं पथस्तत्कवयो वदन्ति॥ –कठोपनिषद(अध्याय 1, वल्ली 3, मंत्र 14) अर्थ– उठो, जागो और श्रेष्ठ गुरुजनों को प्राप्त कर उनसे ज्ञान प्राप्त करो। यह सत्य का मार्ग अत्यंत कठिन है, जैसे चाकू की तीव्र धार पर चलना।

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दुःख का कारण क्या ? शायद ‘सुख की प्राप्ति’ न होने से है। अर्थात दुःख का कारण सुख ही है, दुःख का जन्म सुख से होता है। फिर सुख का कारण, इसकी उत्पत्ति कैसे? संभवत: सुख का कारण इच्छाएं है। इच्छाएं क्यों होती है? कारण क्या? क्या हम अधिक चिंतन करते है, जिस कारण इच्छा उत्पन्न होती है🤔

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हमें अपनी संस्कृति, विरासत तथा गौरवमयी इतिहास को विस्मृति के गर्त में नहीं गिरने देना चाहिए, अपितु उसे आत्मसात कर जीवन-चर्या में उतारते हुए आगामी पीढ़ी तक संस्काररूप में प्रेषित करना चाहिए।✨

हमें अपनी संस्कृति, विरासत तथा गौरवमयी इतिहास को विस्मृति के गर्त में नहीं गिरने देना चाहिए, अपितु उसे आत्मसात कर जीवन-चर्या में उतारते हुए आगामी पीढ़ी तक संस्काररूप में प्रेषित करना चाहिए।✨