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मल्हार🍁

@the_saarang

गौरी का मल्हार..❤️❤️
मन जोगी, तुम 'सारंगी'। 😊

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तुम्हारे उस हरे रंग के पल्लू से कुछ बूंदें बँधी हैं गिरने को उत्सुक हाँ.. आषाढ़, सावन, भादो किस उत्सव सी ? जो भी कहो.. किसी साँझ उस बंधन को खोल दो सारी रात मेघ बरसे सारी रात प्रेम बरसे। 💚💚❤️🌿🌿 #वत्स_राय

तुम्हारे उस 
हरे रंग के पल्लू से 
कुछ बूंदें बँधी हैं
गिरने को उत्सुक
हाँ.. 
आषाढ़, सावन, भादो
किस उत्सव सी ?
जो भी कहो.. 
किसी साँझ
उस बंधन को खोल दो

सारी रात मेघ बरसे
सारी रात प्रेम बरसे।
💚💚❤️🌿🌿
#वत्स_राय
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जानती हो! वो समय सुकुमार था जो सहेज लिया जाना चाहिए हमेशा के लिए। इस कठोर समय से कुछ जलते-तपते क्षणों को चुरा कर ... उस कोमल समय से गले भेंट कर रोने को मन करता है। उसकी छाँव तले मिट्टी हो जाऊंगा पर मैं अब कभी लौट कर नहीं आऊंगा।

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बचपन में जब न खाने कि जिद करता था तब माँ कौर बांट देती थी.. कभी गाय, बछिया तो कभी गौरैया के नाम पर.. कहती थी कि देखो सब मांग रहे हैं और मैं खा लेता था। आज मैं कोई जिद नहीं करता.. डायरी, कविताएं, कहानियां ये सब मेरा दुःख मांगते हैं.. सबमें बांटता हूं और दुःख चुपचाप खा लेता हूं। 🖤

बचपन में जब न खाने कि जिद करता था तब माँ कौर बांट देती थी.. कभी गाय, बछिया तो कभी गौरैया के नाम पर.. कहती थी कि देखो सब मांग रहे हैं और मैं खा लेता था।
आज मैं कोई जिद नहीं करता.. डायरी, कविताएं, कहानियां ये सब मेरा दुःख मांगते हैं.. सबमें बांटता हूं और दुःख चुपचाप खा लेता हूं। 🖤
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आज करे सो काल्ह कर, काल्ह करे सो परसो। कुछ भी जल्दी मत करो, जीना है अभी बरसो..।🥳 ~ फलाने

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चटकती लकड़ियां मन में वैराग‌ लाती हैं। उन लपटों में एक जोगी का आभास होता है। वो मानों पुकारता हो.. खींचता हो, पुचकारता हो.. एक अजीब सा सम्मोहन है उसकी दहकती, लाल अंगार जैसी आँखों में.. उसकी खंजड़ी बजती है.. हम सरपट भाग जाना चाहते हैं उसके पीछे..। मन एक सिरे से टूट सा जाता है। 🖤

चटकती लकड़ियां मन में वैराग‌ लाती हैं। उन लपटों में एक जोगी का आभास होता है। वो मानों पुकारता हो.. खींचता हो, पुचकारता हो.. एक अजीब सा सम्मोहन है उसकी दहकती, लाल अंगार जैसी आँखों में.. उसकी खंजड़ी बजती है.. हम सरपट भाग जाना चाहते हैं उसके पीछे..।
मन एक सिरे से टूट सा जाता है। 🖤
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कभी-कभी एक धुंधला सा स्वप्न आता है। रात किसी सबसे उदास पहर में तुम दिखती हो। एक साँझ, बेरंग सा चाँद और एक कच्ची राह जिस पर पैरों के निशान ना के बराबर हैं। मैं पुकारता हूं, कुछ शब्द लुढ़कते हैं.. पर, आवाज तुम तक नहीं जाती.. सबकुछ श्वेत पड़ जाता है। हमारे हिस्से बस यही आया।..शेष।🚶

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छुटपन में दादी एक कहानी सुनाती थी। जिसमें एक भिक्षुक था। जो सारे दिन घूम-घूम कर भिक्षा मांगता, पर उसे कभी भी पेट भर कर भोजन नहीं मिलता। मेरा मन भी अब उस भिक्षुक सा है। मैं सारा दिन हर जगह से खुशियों के कतरे जुटाता हूं.. पर कोई ऐसा दिन नहीं आता जब मैं जी भर मुस्कुरा पाऊं। 🖤🖤🖤

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वो आईना देखती है और मैं उसे। अक्सर वो पूछ बैठती है, "क्या देखते हो ?" मैं कहता हूं इंद्रधनुष के रंग, सिंदूरी साँझ, काले मेघ, पारिजात के फूल, कविताएं, कहानी और जाने कितने शब्द.. जो तुमसे उभर कर कमरे में भर जाते। चटख लाल टिकुली साटे, वो मुस्कुरा देती है.. श्रृंगार पूरा हो जाता। ❤️

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कभी-कभी सोचता हूं.. किसी दिन अपना बेरंग सा मन छोड़ जाऊं तुम्हारे पास..। मैं जानता हूं फिर जिस दिन लौटा कभी, एक ऐसी ही खूबसूरत शाम भरी होगी उसमें। ❤️

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जब भी जाना..( जाना नियति है) सिरहाने छोड़ जाना मुट्ठी भर आस के बीज.. मन के किसी एक हिस्से में.. जीवित रहेगा सबकुछ, हमेशा थोड़ी हरियाली, थोड़ी नमी और तुम्हारे लौट कर आने की उम्मीद... शेष....💔

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कितनी खाली रहती है अब रातें.. दूर-दूर तक कोई आवाज, कोई हलचल नहीं। मुर्दा शांति फैली है। मैं उठता हूं बेचैन, जैसे कोई शब्द ढूंढ रहा हूं, कोई भाव.. कोई तिनका इस रात के दूसरे सिरे तक पहुंचने के लिए। सुनो दोस्त! कुछ लिखो..।.…

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कभी-कभी मन उतना ही शान्त होता है जैसे किसी कमरे में कोई निश्चेष्ट देह.. ठंडी पड़ी हो। रक्त कुछ दूर बह कर फर्श पर जम गया हो। घड़ी का गज़र जैसे शोकाघात से थम गया हो। कोई शोर नहीं.. जैसे अकस्मात कोई.. जीवन छोड़ गया हो। 🖤🖤

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एक नींद है जो कोसों दूर चली जाती है..। एक जिन्दगी है खुद को उधेड़ लेती है..। एक खिड़की जो खुलना नहीं चाहती..। एक कमरा है जो अंधेरा चाहता है..। एक कहानी है जिसके हिस्से कोई नहीं आया..। हर रात ठंडे फर्श पर आत्मा का रक्त रिस कर जम जाता है..। हर रात हाथों से जीवन फिसल जाता है..🖤🖤🖤